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उत्तरकाशी आपदा में प्रकृति का कितना दोष, मूल कैचेमेंट क्षेत्र तक ही फैला है मलबा…..मूल कैचेंट क्षेत्र में निर्माण रही भूल

उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धराली गांव में बहने वाली खीर गंगा नदी में तबाही के जो बादल गरजे हैं उन्होंने वर्तमान समय में धराली की तस्वीर को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। जहां एक समय में होटल, होम स्टे और ग्रामीणों के घर मौजूद हुआ करते थे, वहां बस अब मलबे का पहाड़ पड़ा है जिसके नीचे न जाने कितनी जिंदगियों की चीखे मौन हो चुकी हैं। बहरहाल, वर्तमान समय में सभी साक्ष्य एक स्वर में यह कह रहे हैं कि खीर गंगा नदी में हुआ निर्माण प्रकृति की गोद में बसना नहीं बल्कि प्रकृति की राह में खड़े होना जैसा है।

उत्तरकाशी आपदा में प्रकृति का कितना दोष

    उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धराली गांव में बहने वाली खीर गंगा नदी में तबाही के जो बादल गरजे हैं उन्होंने वर्तमान समय में धराली की तस्वीर को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। जहां एक समय में होटल, होम स्टे और ग्रामीणों के घर मौजूद हुआ करते थे, वहां बस अब मलबे का पहाड़ पड़ा है जिसके नीचे न जाने कितनी जिंदगियों की चीखे मौन हो चुकी हैं। उत्तरकाशी में आई आपदा से पूरा उत्तराखंड स्तब्ध है लेकिन सवाल अब भी वही है कि क्या इसमें दोष प्रकृति का है या फिर यह मानव द्वारा औद्योगिकी और विकास की भूख में हुई सबसे बड़ी भूल है। चूंकि धराली में खीर गंगा की तबाही मानव द्वारा प्रकृति को न समझने के परिणामों की ओर इशारा करती है, बेशक खीर गंगा से निकली तबाही ने मानव की बसागत को जमींदोज कर दिया, लेकिन इसमें प्रकृति का कोई दोष नहीं है। न तो उच्च हिमालयी क्षेत्रों में इस प्रकार की घटनाएं होना असामान्य है और न ही खीर गंगा में आई तबाही में प्रकृति का दोष है, हां, असामान्य है तो वह यह कि मानव स्वयं ही जाकर प्रकृति की राह में जाकर खड़ा हो चुका है।  

मूल कैचेमेंट क्षेत्र तक ही फैला मलबा

    उत्तरकाशी स्थित खीर गंगा में मची तबाही को लेकर इसरो की ओर से जारी किए गए सेटेलाइट चित्र इस बात के साक्षी हैं कि जलप्रलय में जो मलबा आया वह, खीर गंगा के मूल कैचमेंट (जलग्राही क्षेत्र) में ही जाकर पसरा और ठहर गया। वहीं भूविज्ञानी और एचएनबी गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के एचओडी प्रो एमपीएस बिष्ट के अनुसार खीर गंगा का कैचमेंट निचले क्षेत्र में 50 से 100 मीटर तक फैला है। श्रीकण्ठ पर्वत के ग्लेशियर से यह क्षेत्र तीव्र ढाल के साथ खीर गंगा के माध्यम से सीधे जुड़ा है, लिहाजा इससे स्पष्ट होता है कि निचले क्षेत्र में जो भी बसावट हुई, वह वर्तमान की भांति ही दशकों पहले आए मलबे के ऊपर की गई और अब उसी कैचमेंट में फिर से मलबा पसर गया है। अर्थात एक तरह से देखा जाए तो नदी ने अपना क्षेत्र वापस लिया है, या यूं कहा जाए कि नदी अपने मूल स्वरुप में लौटी है। कुछ ऐसा ही नजारा धराली से एक किलोमीटर आगे हर्षिल घाटी में नजर आता है। हालांकि, वहां आबादी न होने के कारण कोई नुकसान नहीं हुआ।  

मूल कैचेंट क्षेत्र में निर्माण रही भूल

  बहरहाल, वर्तमान समय में सभी साक्ष्य एक स्वर में यह कह रहे हैं कि खीर गंगा नदी में हुआ निर्माण प्रकृति की गोद में बसना नहीं बल्कि प्रकृति की राह में खड़े होना जैसा है। लिहाजा उत्तराखंड सरकार को चाहिए की वह मलबे से भरे पूरे क्षेत्र की मैपिंग कराकर वहां किसी भी प्रकार के निर्माण को प्रतिबंधित करे ताकि भविष्य में हमें फिर धराली जैसा दंश न झेलना पड़े। धराली में हुई यह त्रासदी हमारे लिए एक नया सबक भी है कि प्रकृति जब चाहे तब हमसे अपना अनुदानित क्षेत्र वापिस ले सकती है।        
लेखक- शुभम तिवारी (HNN24X7)

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